गुरुवार, 20 जनवरी 2011

सुनो सरगम !


दुनिया बावली है , सरगम !
इसे बावलों के सिवा सब
बददिमाग़ नज़र आते हैं


हम कोई पाप नहीं कर रहे सरगम !
नहीं तो सोचो -
तुम्हारे और मेरे
दो अलहदा रास्ते
क्यों एक नज़र आते हैं !!


तेरी नियति से मेरी नियति
जुड़ गयी है , रे पगली !
"ये प्यार है"-
प्यार करने वाले कह जाते हैं ..
 सुनो सरगम !

तुम्हें कुछ देना ही सब पाना है


प्यार की इस दीवार पे , सरगम!
स्वार्थ की ज़रा-सी दूब
ज़रूर उग आई है:
उघाड़ कर देखो -


तुम्हें कुछ देना ही सब पाना है


अकेला हूँ !


पहले ही दुनिया में -
मेट्रो में , अस्पतालों में ,
सड़कों पर , रेस्त्रां ,
बड़े - बड़े सेमिनारों में -
हर नये दिन वे लोग मिलते हैं
जो कल नहीं मिले थे .


अब गर तुम भी ?
हँ ..
दुनिया का पिंजरा , सरगम!
बड़ा होता जायेगा
( अगर्चे वो कैद ही रहेगी )
ऐसा कि ..
आवाज़ों का कारवाँ
कभी लौट नहीं पायेगा

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

एक बेईमान कवि की रचना - प्रक्रिया

चलूँ , एक  कविता बनाऊँ !
कब तक ताकूँ राह 
भाव - तरंगों की !
सामने का उथला
भाव - सरोवर 
तरंगायित नहीं तो क्या ?
चलूँ , इसी में कूद पडूँ!


बेचैन नहीं दिल आज ; यही बेचैनी है 
उफ़ क्या चीज़ है कविता भी !?..
छोड़ती नहीं 
बेतकल्लुफ़ कभी 


मैं कूद पड़ा
इस उथले भाव - सरोवर में
नीचे निकट की सतह में
तलवों ने मेरे चिन्ह दिये 


कुछ आगे बढूँ ?


कोशिश में क्या हर्ज़ है ?
कविताई भी 
अजीब मर्ज़ है !!


आगे चार क़दम की चाल -
डूबने का डर 
कर गया बेहाल 


वहाँ और आगे-
गहराइयों में झिलमिलाती
खोती जाती 
सतह ललकारती 
करती 
है सवाल 


उत्तर भी देती है 
( पर, बिखरे चित्रों में  )


वे चित्र बड़े ही अस्त - व्यस्त 
बेढब हैं !


फहरने लगता है आगे का 
जल - तल वितान 
बुनावट सतह की बदलती है पल - छिन


चित्र वे ही 
वे अस्त - व्यस्त 
और वे बेढब 
जुड़ते हैं ...सजते हैं 


उभरता है -
चित्र -
सुपरिभाषित 

सतह पर बने उस चित्र से फिर गूँजा-
ललकार भरा आमंत्रण !


पर आगे गहराइयों में 
उतरने का साहस नहीं 
पलट कर देखा भीटे पर 
खड़ा है मुस्कराता कोई 
आत्म-प्रवंचना की हँसी 
संवाद कर गयी  
कि ....


'' नहाने आया था भई 
लौट चलूँ , शायद ,
कोई कविता भी बन गयी ''
 

बुधवार, 5 जनवरी 2011

पानी का पुल

एक रोज़ जब सुबह हुई
तो जैसे रात दूर न थी
और भान हुआ कि
जब रात आएगी तो
सुबह बहुत दूर होगी


दिन से रात जैसे सट-सी गयी है
कोई फासला नहीं ..
दिन छूट जाता है
निष्प्रयास !
निःश्वास - सा


पर , एक पानी का पुल है --
पानी का पुल
कि रात छोड़ दिन पर जायें , जा ठहरें ..


ठहरना तो सपना है


हकीकत है बहना


पानी के पुल पर पाँव धँसते हैं
पुल टूटता नहीं --
फट जाता है .
चित्त
फट जाता है .


पैरों से मेरे
पानी झरता है


दिन इतनी दू...र
क्यों है माँ ?


 आज तुम्हारे पास सो जाऊँ ?

रविवार, 19 दिसंबर 2010

भीगी पतंग

तुम्हें आकाश पाकर
पतंग यह मन
हुआ जाता है  
उमग कर औ...र
तनकर
बेइन्तहां...यह
उड़ा जाता है
तुम्हें आकाश पाकर




इस ठुके मन की ;
पिटे मन की ;
अननुमानित ,
औचक
उड़ान पर


भवें बंकिम तुम्हारे भीतर के
बादल की


करुना थी
वह शमकारी ;
उस बादल से
जो बरसी थी


भीगी ...हँ,
मेहरायी...
फटी ..
गिरी ...
पतंग
मेरी ...


करुना थी वह ?
मैं  सिर हिलाता
रह गया
उस किसान
की तरह
जो लगान
की मुआफ़ी
की अरज़ी
के ठुकरा दिये
जाने पर ; होंठों पर
अकाल मृत्यु की ओर दौड़ती
हँसी लिये रोता था

सुलझा दी..

छूकर तुम्हारी याद ने


गाँठ


अर्थहीनता की


झट से


सुलझा दी ...

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

लो , मैं फिर

चाह तेरी है , पर
राह
    नहीं दीखती


सुना --
तू
   सागर - गर्भित है , पर
उस सागर की
थाह 
    नहीं दीखती


कुछ आशा बँध
भी जाये तो ले उड़ती है--
निश्चय की झूठी मुस्कान


लो,
      मैं फिर अनजान